Tuesday, May 19, 2026
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फरीदाबाद की सबसे बड़ी 131 लीटर गंगाजल कांवड़ यात्रा पहुंची, श्रद्धा और संकल्प का दिखा अद्भुत संगम

-गौमाता के सम्मान के लिए लाए गंगाजल

6 मई को हरिद्वार से शुरू हुई और 23 जुलाई को होगा जलाभिषेक

हिंदुस्तान तहलका / दीपा राणा

फरीदाबाद।  सावन के पावन महीने की शुरुआत के साथ ही पूरे उत्तर भारत में भगवान शिव के भक्तों का उत्साह चरम पर है। हरिद्वार, गंगोत्री और गोमुख जैसे तीर्थ स्थलों से कांवड़ लाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है, और इस वर्ष भी यह आस्था से परिपूर्ण यात्रा भक्तों के जोश और भक्ति का प्रतीक बनी हुई है।

फरीदाबाद के गांव डीग निवासी जतिन राव और उनकी 15 सदस्यीय टीम ने हरिद्वार से 131 लीटर गंगाजल से भरी भारी कांवड़ को कंधों पर उठाकर यात्रा शुरू की, जो अब फरीदाबाद पहुंच चुकी है। यह अब तक की फरीदाबाद की सबसे बड़ी कांवड़ मानी जा रही है।

फरीदाबाद के गांव डीग निवासी जतिन राव

भोले जतिन राव ने बताया कि यह यात्रा 6 मई को हरिद्वार से शुरू हुई थी और 23 जुलाई को वह भगवान शिव पर जलाभिषेक करेंगे। भोले ने बताया कि यह केवल एक कांवड़ यात्रा नहीं है, बल्कि एक संकल्प है। हमने इस बार की कावड़ गौमाता के सम्मान में उठाई है। हमारी मांग है कि गौमाता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिया जाए। यही हमारी इस यात्रा का उद्देश्य है।

131 लीटर गंगाजल से भरी कांवड़ लेकर चलना एक बड़ी चुनौती थी। भोले जतिन कहते हैं कि इतनी भारी कांवड़ उठाकर इतनी लंबी दूरी तय करना आसान नहीं था। लेकिन भोले बाबा की कृपा से न कोई थकावट महसूस हुई और न ही कोई दर्द। उन्होंने इसे भक्ति, श्रद्धा और आत्मबल का अद्भुत संगम बताया।

यात्रा के दौरान जतिन और उनकी टीम को अलग-अलग राज्यों में अलग अनुभव हुए। उत्तराखंड में उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिला, जबकि उत्तर प्रदेश में उन्हें सेवा और सत्कार का बहुत अच्छा अनुभव हुआ। हरियाणा में स्थिति मिली-जुली रही, लेकिन उनकी आस्था और संकल्प में कोई कमी नहीं आई।

भोले जतिन राव इससे पहले भी कई बार कांवड़ यात्रा कर चुके हैं, लेकिन इस बार की यात्रा उनके लिए बेहद खास रही। 131 लीटर जल के साथ यह यात्रा न केवल भक्ति का प्रतीक है, बल्कि एक सामाजिक संदेश भी दे रही है। गौमाता के प्रति सम्मान और भारतीय संस्कृति की जड़ों से जुड़ाव। फरीदाबाद में जैसे ही यह विशेष कांवड़ पहुंची, स्थानीय लोगों ने भव्य स्वागत किया और श्रद्धा से इसका दर्शन किया। जतिन और उनकी टीम की यह भक्ति भरी यात्रा पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गई है।

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