हिंदुस्तान तहलका / दीपा राणा
फरीदाबाद। अरावली पर्वतमाला की गोद में बसा हरियाणा का एक छोटा-सा गांव-अनंगपुर, अपने भीतर इतिहास, वीरता और भक्ति की अनसुनी कहानियां समेटे हुए है। यह वही धरती है, जहां आज़ादी की लड़ाई की गूंजें गुरुकुल इंद्रप्रस्थ की दीवारों से टकराकर निकली थीं। यहां कभी शहीद-ए-आजम भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और सरदार वल्लभ भाई पटेल जैसे स्वतंत्रता सेनानी अपनी क्रांतिकारी रणनीतियों को आकार दिया करते थे।
इस गुरुकुल की सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद गांव के लोगों ने उठाई थी। वे ऊंची पर्वतमालाओं की तलहटी में छिपकर अंग्रेजों की गतिविधियों पर नज़र रखते थे। उनकी हिम्मत और गुप्त सेवा ने कई बार आज़ादी के आंदोलन को टूटने से बचाया।

इतिहास की गहराई में: महाराजा अनंगपाल और जल संरक्षण
अंग्रेजों से पहले यह क्षेत्र महाराजा अनंगपाल तंवर गुर्जर की रियासत का हिस्सा था। उन्हीं के नाम पर इस गांव को अनंगपुर नाम मिला। महाराजा ने अरावली की सबसे बड़ी झील के लिए एक विशाल बांध बनवाया, जो आज भी उसी गर्व से खड़ा है। इस झील से गांव के साथ-साथ आस-पास के इलाकों-लकड़पुर, मीठापुर, सराय, मदनपुर खादर-तक मीठा पानी पहुंचता था। यह सिर्फ जलस्रोत नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की जीवनरेखा थी। आज वो सूखा और वीरान है
गांव का हीरो: शहीद कढेरू
साल 1907, लगातार बारिश ने गांव की नींव तक को हिला दिया। झील का पानी बांध में भर चुका था और गांव डूबने की कगार पर था। चार मोहल्लों से चार नौजवान आगे आए, पर कढेरू ने जान की परवाह किए बिना बहते पानी में कूदकर बांध का दरवाजा खोल दिया। जैसे ही गेट खुला, तेज बहाव में वह भी बह गया। तीन दिन बाद उसका शव मिला, लेकिन उसके बलिदान ने पूरे गांव को बचा लिया। तब से गांववाले कढेरू को शहीद मानते हैं। उसकी स्मृति में हर वर्ष आयोजन होते हैं, जिससे नई पीढ़ी उसकी बहादुरी से प्रेरणा ले सके।
ढाणियों से फार्महाउस तक का सफर
अनंगपुर के भीतर ही दो पुराने गांव-धुमसपुर और डोमके नंगला गौण हो चुके हैं। पहले इन्हें ढाणी कहा जाता था, आज ये अनंगपुर का ही हिस्सा हैं। धुमसपुर की ज़मीन अब बड़े-बड़े फार्म हाउसों में तब्दील हो चुकी है, जहाँ राजनेता और उद्योगपति शहर की भागदौड़ से दूर सुकून की तलाश में आते हैं।
विश्वास का केंद्र: हरी पर्वत मंदिर
गांव की सबसे ऊँची चोटी पर स्थित है हरी पर्वत मंदिर, जहाँ माता शेरावाली विराजमान हैं। यह मंदिर एसओएस बाल ग्राम के संचालक जेएन कॉल द्वारा बनवाया गया था और इसकी ज़मीन ग्रामीणों ने स्वेच्छा से दान दी। हर साल यहाँ शांति यज्ञ होता है, जिसमें देश भर से लोग सम्मिलित होते हैं। यह मंदिर अब पूरे गांव के लिए आस्था और एकता का प्रतीक बन चुका है।
जनसंख्या और सांस्कृतिक पहचान
अनंगपुर की आबादी करीब 40 हजार है, जिसमें गुर्जर समुदाय का बाहुल्य है। गांव में भड़ाना गोत्र के लोग निवास करते हैं। ठोंडापाड़ा, बिछपट्टी, पछौला और तरला मोहल्ला-ये चार मोहल्ले इसकी सामाजिक संरचना को दर्शाते हैं। ग्रामीणों की जड़ें राजस्थान के बघेरी गांव से जुड़ी हैं, जो समय के साथ नेकपुर, पाखल और फिर अनंगपुर में बस गए।
अनंगपुर महज एक गांव नहीं, बल्कि इतिहास, बलिदान और आस्था की मिसाल है। यहाँ की मिट्टी में शहीदों की गाथाएं हैं, यहाँ की हवाओं में आज़ादी की खुशबू है और यहाँ की पर्वतमाला पर बसी झीलें और मंदिर भारत की सांस्कृतिक गहराई का प्रतीक हैं।


