हिंदुस्तान तहलका / भरत रावत
125 साल पहले जब डॉ. भीमराव अंबेडकर को स्कूल में ज़मीन पर बैठाया गया था, तब भेदभाव का चेहरा जाति थी। आज हालात बदले हैं, लेकिन तस्वीर वैसी ही है। आज जाति की जगह गरीबी आ गई है और स्कूलों के दरवाज़े आज भी बंद हैं – इस बार ऊँची फीस की दीवारों के पीछे।
भारत में शिक्षा अब अधिकार नहीं, व्यापार बन चुकी है। प्राइवेट स्कूलों की फीस हर साल 10-15% तक बढ़ती है। शिक्षा अब स्टेटस सिंबल बन गई है – जितना ब्रांडेड स्कूल, उतना ऊँचा रुतबा। लेकिन इसका असली सवाल ये है: लाखों रुपये खर्च करके हम बच्चों को क्या दे पा रहे हैं? नतीजा – 10-15 हज़ार की नौकरियां और अधूरी शिक्षा।
आज भारत में करीब 25 करोड़ बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं। इनमें से लगभग 8.5 करोड़ बच्चे प्राइवेट स्कूलों में हैं। और इन स्कूलों की फीस ने देश के मिडिल क्लास की कमर तोड़ दी है। एक जूनियर इंजीनियर की सालभर की तनख्वाह एक स्कूल की सालाना फीस में चली जाती है। गरीब बच्चों के लिए तो इन स्कूलों की दहलीज भी सपना है।
दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों की हालत भी गंभीर है – कहीं शिक्षक नहीं, कहीं इमारत नहीं, कहीं पाठ्यपुस्तकें नहीं। कई स्कूल सिर्फ मिड डे मील के भरोसे चल रहे हैं। ऐसे में माता-पिता कर्ज लेकर, घर खर्च काटकर प्राइवेट स्कूलों का विकल्प चुनते हैं – मजबूरी में।
हालत और भी जटिल हो जाती है जब कोचिंग इंडस्ट्री की बात आती है। स्कूल की पढ़ाई अधूरी रह जाती है, जिसे पूरा करने के लिए कोचिंग सेंटर जाते हैं बच्चे। नतीजा: बच्चा स्कूल, कोचिंग और परीक्षा के दबाव में मशीन बन जाता है। साल 2024 में कोचिंग इंडस्ट्री का आकार 1 लाख करोड़ रुपये हो चुका है।
2019 में एक रिपोर्ट के अनुसार भारतीय अभिभावकों ने प्राइवेट स्कूलों पर 1.75 लाख करोड़ रुपये खर्च किए – जो कई राज्यों के शिक्षा बजट से अधिक है। इसके बावजूद स्कूलों में पढ़ाई नहीं, मुनाफा सबसे बड़ा लक्ष्य बन चुका है। एडमिशन डोनेशन से होता है, यूनिफॉर्म और किताबें स्कूल से ही खरीदनी होती हैं, और फीस कई बार छुपे खर्चों में दुगनी हो जाती है।
सवाल ये है कि जब हम टैक्स देते हैं तो फिर शिक्षा के लिए दोबारा क्यों चुकाएं? सरकारी स्कूलों में सुधार क्यों नहीं हो रहे? क्यों अब भी 10 लाख से ज्यादा शिक्षकों की कमी है? क्यों बच्चों को शिक्षा की जगह बाल मजदूरी, बाल विवाह या अपराध की ओर धकेला जा रहा है?
विकसित देशों में फिनलैंड, कनाडा जैसे उदाहरण हैं जहां शिक्षा मुफ्त, समान और गुणवत्तापूर्ण है। भारत में भी यह संभव है, बशर्ते राजनीतिक इच्छाशक्ति और सामाजिक दबाव हो।
अब जरूरत है
1 प्राइवेट स्कूलों की फीस और डोनेशन पर सख्ती से नियंत्रण की।
2 सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने की
3 शिक्षा बजट को जीडीपी के 6% तक बढ़ाने की।
4 स्कूल और कोचिंग पर पारदर्शिता सुनिश्चित करने की।
शिक्षा व्यापार नहीं, हक है। हमें इसे सौदे से निकालकर हक में बदलना होगा। सवाल पूछना पड़ेगा कि क्या हम फिर किसी अंबेडकर को स्कूल की दहलीज पर खड़ा छोड़ देंगे, या इस बार दीवार गिराकर सभी बच्चों को बराबरी का अधिकार देंगे?


