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एक किलो चावल के लिए 5,000 लीटर पानी! धान की खेती पर जलवायु संकट की मार

हिंदुस्तान तहलका / विष्णु हरि पाठक

एक किलो चावल उगाने में लगभग 3,000 से 5,000 लीटर पानी की ज़रूरत होती है—यह तथ्य दुनिया भर में चावल के उत्पादन और उपभोग पर बहस को नई दिशा दे रहा है। जब दुनिया की लगभग आधी आबादी चावल पर निर्भर है, तो इस अनाज के पीछे छिपी जल-खपत और पर्यावरणीय चुनौतियाँ चिंताजनक हैं।

चावल: भोजन नहीं, परंपरा और पहचान

फिलीपींस से लेकर भारत और बांग्लादेश तक, चावल केवल पेट भरने का ज़रिया नहीं है, यह संस्कृति, त्यौहार और पारिवारिक परंपरा का हिस्सा है। 

धान = ज़्यादा पानी + ज़्यादा मीथेन

अधिकतर धान की खेती बाढ़ग्रस्त इलाकों में होती है, जिससे मिट्टी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और मीथेन गैस का उत्पादन होता है। अंतरराष्ट्रीय राइस रिसर्च इंस्टिट्यूट (IRRI) का कहना है कि चावल उत्पादन वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का 10% तक ज़िम्मेदार है। मीथेन एक अत्यधिक शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है जो वैश्विक तापमान वृद्धि में 30% योगदान देती है।

टेक्नोलॉजी से राहत: AWD तकनीक

ब्रिटेन स्थित चावल कंपनी टिल्डा ने ‘Alternate Wetting and Drying’ (AWD) तकनीक के जरिए धान की खेती में क्रांति लाने की शुरुआत की है। इसके तहत खेतों को लगातार पानी देने के बजाय तब सिंचाई की जाती है जब मिट्टी में नमी का स्तर तय सीमा से नीचे चला जाता है। 2024 में इस तकनीक से:

27% पानी की बचत

28% बिजली और 25% उर्वरक की कमी

मीथेन उत्सर्जन में 45% तक कमी

फसल उत्पादन में 7% की वृद्धि देखी गई।

बदलते मौसम की चुनौतियाँ

भारत में 2024 के धान सीज़न में तापमान 53 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जबकि बांग्लादेश बार-बार बाढ़ से जूझ रहा है।

बाढ़ में टिकाऊ किस्में: उम्मीद की किरण

IRRI 1.32 लाख किस्मों में से ऐसी किस्में विकसित कर रहा है जो बाढ़ में भी 21 दिन तक जीवित रह सकें। इससे उत्पादन पर असर नहीं पड़ता और किसानों को नुकसान भी कम होता है।

क्या चावल का विकल्प हो सकता है?

चीन और बांग्लादेश जैसे देशों ने आलू को विकल्प के रूप में बढ़ावा देने की कोशिश की है, लेकिन सांस्कृतिक जुड़ाव के कारण चावल को पूरी तरह त्याग पाना संभव नहीं हो पाया।

तो क्या करें?

विशेषज्ञों का मानना है कि:

खेती में नई सिंचाई तकनीकों को अपनाना होगा

कम पानी वाली किस्मों का विकास ज़रूरी है

उपभोक्ताओं को भी जागरूक होना पड़ेगा

चावल को पूरी तरह छोड़ना व्यावहारिक नहीं है, लेकिन उसे जिम्मेदारी से उगाना और खाना ही एक स्थायी समाधान हो सकता है।

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