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एनसीईआरटी की नई किताबों में इतिहास का बदलाव: बाबर, अकबर और औरंगज़ेब को लेकर क्यों मचा बवाल?

हिंदुस्तान तहलका / विष्णु हरि पाठक

नई दिल्ली: 17 जुलाई 2025

एनसीईआरटी की कक्षा 8 की नई सोशल साइंस की किताब ‘Exploring Society: India and Beyond’ को लेकर देशभर में विवाद छिड़ गया है। इस किताब में मुगल शासकों बाबर, अकबर और औरंगज़ेब को लेकर ऐसे नए विवरण जोड़े गए हैं जिन्हें कुछ लोग ऐतिहासिक सुधार मान रहे हैं, जबकि कई विशेषज्ञ और संगठन इसे इतिहास के साथ छेड़छाड़ बता रहे हैं।

किताब में क्या बदलाव किए गए हैं?

नई किताब में मुगल काल (13वीं से 17वीं सदी) को लेकर कई नई टिप्पणियां की गई हैं:

बाबर को “हिंसक, बर्बर और पूरी आबादी का सफाया करने वाला विजेता” कहा गया है।

अकबर के बारे में लिखा गया है कि उन्होंने चित्तौड़ विजय के बाद 30,000 नागरिकों का नरसंहार किया और महिलाओं-बच्चों को ग़ुलाम बनाने का आदेश दिया।

किताब में अकबर के कथित बयान का उल्लेख है:

“हमने काफिरो के कई किले और कस्बों पर कब्ज़ा कर लिया और वहाँ इस्लाम की स्थापना की।”

औरंगज़ेब के बारे में लिखा गया है कि उन्होंने मंदिरों और गुरुद्वारों को नष्ट करने का आदेश दिया था, जिनमें बनारस, मथुरा, सोमनाथ जैसे मंदिर और सिखों-जैनों के धार्मिक स्थल शामिल हैं।

एनसीईआरटी ने अपनी सफाई में कहा है कि:

“यह किताब राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और एनसीएफ 2023 के आधार पर तैयार की गई है। इतिहास के तथ्यों को अकादमिक और प्रामाणिक स्रोतों से लिया गया है। एक विशेष अध्याय ‘इतिहास के अंधकारमय अवधि पर टिप्पणी’ में साफ़ किया गया है कि अतीत की घटनाओं के लिए आज किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।”

एनसीईआरटी में सोशल साइंस हेड माइकल डैनिनो ने कहा:

“भारतीय इतिहास को पूरी तरह सुखद नहीं दिखाया जा सकता। हमें यह स्वीकार करना होगा कि उस दौर में बर्बरता और अत्याचार भी हुए थे।”

इतिहासकारों और संगठनों का विरोध-

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य प्रो. मोहम्मद सुलेमान ने इस बदलाव पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि 

“सरकार इतिहास को अपनी विचारधारा के हिसाब से लिखवा रही है। यह भारत की गंगा-जमुनी तहजीब के खिलाफ है। यह नई पीढ़ी को तोड़ेगा, जोड़ेगा नहीं।”

इतिहासकार सैयद इरफ़ान हबीब ने बीबीसी को दिए बयान में कहा:

“इतिहास तथ्यों से बनता है, कल्पनाओं और पूर्वाग्रह से नहीं। मध्यकाल में तुलसीदास, जायसी, कबीर, रहीम जैसे महान रचनाकार भी हुए। क्या वह भी अंधकारमय था?

राजनीतिक संदर्भ: क्या यह वैचारिक एजेंडा है?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में अपने पहले लोकसभा भाषण में कहा था:

“भारत ने 1200 साल की गुलामी झेली है।”

दक्षिणपंथी विचारधारा इस गुलामी की शुरुआत 8वीं सदी में मुस्लिम आक्रमणों से मानती है, जबकि पारंपरिक इतिहासकारों के अनुसार गुलामी का युग ब्रिटिश शासन से शुरू होता है।

इतिहास की लेखिका पार्वती शर्मा कहती हैं कि “बाबर और हुमायूँ भले बाहर से आए, लेकिन अकबर और उसके बाद के मुगल भारत में ही जन्मे| 

इतिहास या पुनर्लेखन?

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है —क्या छात्रों को इतिहास की जटिलता सिखाई जा रही है या उन्हें राजनीतिक रूप से प्रेरित पाठ पढ़ाया जा रहा है?

एनसीईआरटी ने यह भी स्पष्ट किया है कि किताबों में “डिसक्लेमर” भी जोड़ा गया है, ताकि छात्र यह समझें कि अतीत के लिए वर्तमान को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए।

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