हिंदुस्तान तहलका / विष्णु हरि पाठक
हर चैट पर आधा लीटर पानी खर्च, AI बना पर्यावरण पर बोझ
16 जुलाई 2025, नई दिल्ली
आपने कभी सोचा है कि जब आप ChatGPT या Google Bard जैसे AI टूल्स से सवाल पूछते हैं, तो उस जवाब के पीछे क्या खर्च होता है?
न केवल डेटा और बिजली, बल्कि अब यह खुलासा हुआ है कि हर चैट पर लगभग आधा लीटर पानी खर्च हो रहा है।
University of Colorado Riverside और University of Texas Arlington के रिसर्चर्स ने एक विस्तृत शोध में बताया कि AI मॉडल्स को ठंडा रखने के लिए पानी की बड़ी खपत होती है।
AI को पानी क्यों चाहिए?
AI कोई “मानव” नहीं है, लेकिन इसका दिमाग—यानी डेटा सेंटर—लगातार गर्म होता है।
जब भी आप कोई सवाल पूछते हैं, तो यह सवाल दुनिया के किसी सर्वर फार्म में प्रोसेस किया जाता है।
सर्वर के लगातार काम करने से बहुत गर्मी पैदा होती है और उन्हें ठंडा रखने के लिए कूलिंग सिस्टम चलते हैं, जिसमें भारी मात्रा में पानी लगता है।
डेटा सेंटर को ठंडा रखने के दो मुख्य तरीके:
Evaporative Cooling System: भाप आधारित प्रणाली जिसमें पानी का वाष्पीकरण करके ठंडक दी जाती है।
Air Conditioning System: सामान्य एसी आधारित सिस्टम, लेकिन कम प्रभावी और ज्यादा बिजली खर्च करने वाला।
GPT-3 की ट्रेनिंग में ही 7 लाख लीटर पानी की खपत!
Microsoft के अमेरिकी डेटा सेंटर में GPT-3 मॉडल की ट्रेनिंग में 7 लाख लीटर पानी खर्च हुआ, जो कि लगभग 370 BMW या 320 Tesla कारों के निर्माण में उपयोग होने वाले पानी के बराबर है।
अगर यही ट्रेनिंग एशिया के डेटा सेंटर में होती, तो पानी की खपत 21 लाख लीटर तक पहुंच जाती।
हर चैट आधा लीटर पानी गटकता है!
AI मॉडल जैसे ChatGPT या Google Bard जब आपके 20-50 सवालों के जवाब देते हैं, तो लगभग 500 मिलीलीटर पानी प्रति चैट खर्च होता है।
मतलब, अगर करोड़ों लोग रोज AI यूज़ कर रहे हैं, तो ये तकनीक हर दिन लाखों लीटर पानी खा रही है — और वो भी ऐसे वक्त में जब दुनिया के कई हिस्से जल संकट से जूझ रहे हैं।
गूगल का पानी खर्च रिपोर्ट
2021: Google ने 1.25 अरब लीटर (1.25 Billion Liters) पानी खर्च किया।
2022: यह आंकड़ा बढ़कर 15 अरब गैलन (15 Billion Gallons) हो गया!
सिर्फ ChatGPT ही नहीं, Bard, Claude, Gemini, Copilot जैसे सारे AI टूल्स एक ही सिस्टम पर आधारित हैं, जिनकी बुनियाद ही सर्वर फार्म पर टिकी है।
क्या हैं पर्यावरणीय खतरे?
जल संकट गहराएगा: ऐसे क्षेत्रों में जहां पहले से पानी की कमी है, वहां डेटा सेंटर नई समस्या बनेंगे।
बिजली की खपत: AI मॉडल्स भारी बिजली भी खाते हैं। अगर यह बिजली कोयला या नॉन-रिन्यूएबल सोर्स से आ रही हो, तो कार्बन उत्सर्जन और बढ़ता है।
स्थानीय पारिस्थितिकी प्रभावित: पानी की ज़रूरत पूरी करने के लिए कई बार नदियों और ग्राउंडवॉटर का अति-शोषण होता है।
क्या हो सकता है समाधान?
कंपनियों को चाहिए कि वे वॉटर-न्यूट्रल टेक्नोलॉजी की ओर कदम बढ़ाएं।
रीसायक्लिंग सिस्टम और रिन्यूएबल एनर्जी बेस्ड कूलिंग पर जोर दिया जाए।
यूज़र्स को भी यह समझना होगा कि हर AI इस्तेमाल का पर्यावरणीय मूल्य है।
AI स्मार्ट है, लेकिन कीमत बड़ी है
हम जिस AI टेक्नोलॉजी को “मुफ्त सुविधा” मानते हैं, वह दरअसल हमारी धरती से बेशकीमती संसाधन खींच रही है।
अब समय है कि हम डिजिटल फैसलों को भी सस्टेनेबिलिटी और जिम्मेदारी से लें।
क्या आप जानते थे कि आपकी एक चैट में इतना पानी खर्च होता है?


