हिंदुस्तान तहलका / विष्णु हरि पाठक
भारत के ‘जेम्स बॉन्ड’ अजीत डोभाल 20 जनवरी 1945 को उत्तराखंड के एक गढ़वाली परिवार में जन्मे अजीत डोभाल का नाम आज भारत की सुरक्षा नीति और खुफिया रणनीतियों का पर्याय बन चुका है। 1968 बैच के केरल कैडर के आईपीएस अधिकारी डोभाल ने 1972 में भारत की खुफिया एजेंसी रॉ (RAW) से जुड़कर असाधारण सेवा दी। वे सात वर्षों तक पाकिस्तान में अंडरकवर एजेंट रहे, जहां उन्होंने भारत के लिए जान जोखिम में डालकर कई अहम जानकारियाँ जुटाईं।
आज जब भी राष्ट्रीय सुरक्षा की बात होती है, अजीत डोभाल का नाम सबसे पहले लिया जाता है। वे एक रणनीतिकार हैं, एक विचारक हैं और एक ऐसे राष्ट्रभक्त हैं, जो सिर्फ़ अपनी मातृभूमि के लिए जीते हैं।
डोभाल का दर्द: जब अपनों ने साथ नहीं दिया-
डोभाल ने एक भाषण में वह गहरी पीड़ा साझा की, जो उन्हें आज भी अंदर तक कचोटती है। उन्होंने कहा,
“भारत विदेशी ताकतों से उतना नहीं हारा, जितना अपनों के साथ न देने से हारा है।”
यह वाक्य न सिर्फ उनके अनुभवों की गहराई को दर्शाता है, बल्कि देश को चेतावनी भी देता है कि सबसे बड़ा खतरा बाहर से नहीं, अंदर से होता है।
उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा अंग्रेजों ने कभी भी भारतीय फौज के बिना भारत पर युद्ध नहीं जीते। बंगाल नेटिव आर्मी, गोरखा, सिख सभी ने उनके साथ दिया। जब-जब भारत पर आक्रमण हुआ, तब-तब लश्कर हमारे देश के लोगों के बीच से ही खड़े हुए।”
आज भी डर है कि अपने ही देश का सौदा न कर बैठें-
डोभाल का सबसे बड़ा डर यह है कि कहीं हमारे ही देशवासी राष्ट्र की अस्मिता का सौदा न कर दें। उन्होंने साफ कहा,
“देश को सबसे बड़ा खतरा उन आंतरिक शक्तियों से है, जो अपने आज के लाभ के लिए कल को अंधकार में डाल सकते हैं।”
उनकी बात आज भी प्रासंगिक है—चाहे वह सोशल मीडिया पर राष्ट्रविरोधी नैरेटिव हो या राजनीतिक स्वार्थ के लिए राष्ट्रीय हितों की बलि। उन्होंने कहा कि इसके खिलाफ जागरूकता और ताकत समाज से ही आएगी-खासकर युवाओं से।
राष्ट्रीय सुरक्षा में डोभाल की भूमिका
- ऑपरेशन ब्लैक थंडर में प्रमुख रणनीतिक भूमिका
- कंधार विमान अपहरण (1999) में आतंकियों से बातचीत
- पाकिस्तान में अंडरकवर मिशन में 7 साल की सेवा
- चीन के खिलाफ रणनीति, कश्मीर नीति और उग्रवाद विरोधी कार्य में शानदार प्रदर्शन
अजीत डोभाल का जीवन सिर्फ एक जासूस या सलाहकार का नहीं, बल्कि एक राष्ट्रसेवक का है। उनके अनुभवों से देश को न सिर्फ सुरक्षा मिली, बल्कि वह चेतावनी भी, जिसे आज का भारत अनदेखा नहीं कर सकता।


