हिंदुस्तान तहलका / विष्णु हरि पाठक
अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर भारत पर 25 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ़ लगा दिया है जिससे कुल टैरिफ़ 50 प्रतिशत हो गया है। व्हाइट हाउस ने यह कार्रवाई रूस से तेल खरीदने को कारण बताया है लेकिन क्या वजह सिर्फ़ यही है?
विशेषज्ञों और वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरणों को देखने के बाद स्पष्ट होता है कि ट्रंप की नाराज़गी बहुपक्षीय है सिर्फ़ रूस से तेल खरीदना नहीं बल्कि भारत की स्वतंत्र विदेश नीति, ब्रिक्स में भूमिका, ट्रेड डील में अनबन और चीन से रिश्ते जैसे कई मसले हैं जो अमेरिका को खटक रहे हैं। आइए इन पांच बड़ी वजहों पर गहराई से नज़र डालते हैं।
ब्रिक्स: डॉलर की बादशाहत पर भारत की चुप्पी?
ब्रिक्स (BRICS) अब सिर्फ़ पांच देशों का समूह नहीं रहा इसमें ईरान, इथियोपिया, इंडोनेशिया, मिस्र और यूएई जैसे देश भी शामिल हो चुके हैं। यह समूह एक वैकल्पिक आर्थिक व्यवस्था बनाने की दिशा में काम कर रहा है जिसमें डॉलर पर निर्भरता कम करने की स्पष्ट कोशिश है।
ट्रंप को सबसे बड़ा डर यही है वैश्विक व्यापार में डॉलर की पकड़ कमजोर न हो जाए। ब्रिक्स का विस्तार और उसमें भारत की सक्रिय भागीदारी अमेरिका को यह संकेत देती है कि भारत गुटनिरपेक्ष भूमिका से आगे बढ़ रहा है। यही वजह है कि ट्रंप भारत को सीधे निशाने पर ले रहे हैं भले ही चीन और तुर्की जैसे देश रूस से कहीं ज़्यादा तेल खरीद रहे हों।
अधूरी ट्रेड डील और टैरिफ किंग का तमगा-
डोनाल्ड ट्रंप का भारत के प्रति गुस्सा व्यापार समझौते (Trade Deal) को लेकर भी है। अमेरिका लंबे समय से चाहता है कि भारत अपने बाज़ार अमेरिकी कंपनियों के लिए पूरी तरह खोल दे लेकिन भारत का ध्यान अपनी घरेलू अर्थव्यवस्था और किसानों की सुरक्षा पर है।
ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिका दौरे के समय भारत को टैरिफ किंग करार दिया था। यह बयान अकेले व्यापार की बात नहीं करता बल्कि यह दिखाता है कि अमेरिका भारत से एकतरफा रियायतें चाहता है जो भारत को स्वीकार नहीं।
चीन से बढ़ती कूटनीतिक दूरी कम होती दिख रही है-
हाल के महीनों में भारत और चीन के बीच संबंधों में नरमी आई है। प्रधानमंत्री मोदी का आगामी एससीओ समिट में चीन दौरा भारत-चीन के बीच कैलाश मानसरोवर यात्रा की बहाली, सीधी उड़ानों की संभावनाएं ये सभी घटनाएं अमेरिका को यह संकेत दे रही हैं कि भारत और चीन के रिश्ते सुधर रहे हैं।
ट्रंप के लिए चीन वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी है। ऐसे में भारत का चीन के साथ संबंध बेहतर होना ट्रंप की रणनीतिक प्राथमिकताओं के विपरीत है।
ऑपरेशन सिंदूर और नोबेल की चाहत-
पाकिस्तान के खिलाफ भारत के ऑपरेशन सिंदूर के बाद हुए संघर्ष विराम पर ट्रंप बार-बार दावा करते हैं कि ये उनके हस्तक्षेप का नतीजा था। लेकिन भारत ने कभी अमेरिका को इस प्रक्रिया का श्रेय नहीं दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार की उम्मीद में थे और भारत की चुप्पी उन्हें अखर रही है।
ट्रंप की राजनीति पब्लिक इमेज और वैधता पर आधारित है। जब उन्हें उस छवि का समर्थन नहीं मिलता वो आर्थिक और कूटनीतिक दंड की तरफ झुकते हैं।
नॉन-टैरिफ बैरियर: अमेरिका को चाहिए पूरी छूट-
अमेरिका सिर्फ़ टैरिफ़ में कटौती नहीं चाहता वो भारत से नॉन-टैरिफ बैरियर जैसे कि गुणवत्ता जांच, लाइसेंसिंग और स्थानीय प्राथमिकताओं को भी हटाने की मांग करता है।
लेकिन भारत जैसे विकासशील देश के लिए यह खतरनाक हो सकता है। अगर भारत अमेरिकी कंपनियों को पूरा एक्सेस दे देता है तो उसकी स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग, किसानों और डेयरी इंडस्ट्री पर बड़ा असर पड़ेगा।
डोनाल्ड ट्रंप की भारत के प्रति नाराज़गी केवल एक व्यापारिक मुद्दा नहीं है यह भूराजनीतिक असंतुलन, महत्वाकांक्षाओं की टकराहट और भारत की रणनीतिक स्वतंत्रता का मुद्दा है।
भारत फिलहाल संतुलन बनाए रखने की नीति पर चल रहा है। लेकिन जिस तरह अमेरिका ने भारत को अकेला निशाना बनाया है उससे एक बात तो साफ है अगले कुछ सालों में भारत को अपनी विदेश नीति और रणनीतिक प्राथमिकताओं को और अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित करना होगा।


