हिंदुस्तान तहलका / विष्णु हरि पाठक
हिमाचल प्रदेश के सिरमौर ज़िले के शिलाई गांव में हाल ही में एक अनोखी शादी चर्चा का विषय बन गई है। कुंहाट गांव की सुनीता चौहान ने दो सगे भाइयों प्रदीप नेगी और कपिल नेगी से एक साथ विवाह किया है। यह विवाह हाटी समुदाय की पारंपरिक बहुपति प्रथा ‘जोड़ीदारा’ या ‘जाजड़ा’ के अंतर्गत हुआ है।
सांस्कृतिक पृष्ठभूमि: जोड़ीदारा प्रथा क्या है?
हाटी समुदाय जो सिरमौर के ट्रांस गिरी क्षेत्र और उत्तराखंड के जौनसार-बावर व रवाई-जौनपुर इलाक़ों में निवास करता है इस प्रथा को लंबे समय से अपनाता आया है। इस परंपरा के तहत एक महिला दो या अधिक भाइयों से विवाह कर सकती है जिससे पारिवारिक एकता बनी रहती है और संपत्ति का विभाजन रोका जाता है। जोड़ीदारा विवाह में आम तौर पर बारात दुल्हन के घर नहीं बल्कि दूल्हों के घर जाती है और यह विवाह ‘रमलसार पूजा’ के अनुसार बिना फेरों के ‘सिन्ज’ रस्म के साथ संपन्न होता है।
हाल की शादी की विशेषताएं-
इस विवाह में शामिल सभी व्यक्ति पढ़े-लिखे हैं। सुनीता चौहान आईटीआई पास हैं जबकि प्रदीप नेगी राज्य सरकार के जल शक्ति विभाग में कार्यरत हैं और कपिल नेगी विदेश में हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में कार्यरत हैं। शादी को लेकर सुनीता ने स्पष्ट रूप से कहा, “यह मेरा खुद का निर्णय था। मैं इस परंपरा को जानती थी और स्वेच्छा से इसे अपनाया।”
क़ानूनी और सामाजिक विवाद-
हालांकि यह विवाह सांस्कृतिक रूप से मान्य है लेकिन कानूनी दृष्टिकोण से इसकी वैधता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 5 केवल एक पति-पत्नी विवाह को मान्यता देती है। इस पर हिमाचल हाईकोर्ट के वकील सुशील गौतम का कहना है कि क्योंकि दोनों विवाह एक साथ संपन्न हुए हैं इसलिए बीएनएस की धारा 32 और विवाह अधिनियम की धारा 5 लागू नहीं होती।
ऑल इंडिया डेमोक्रेटिक वीमेन्स एसोसिएशन जैसी महिला संगठन इस प्रथा को महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ बताते हैं। वहीं हाटी समुदाय के लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह परंपरा सांस्कृतिक विरासत का अंग है और परिवार की एकता व स्थिरता को बढ़ावा देती है।
हाटी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा
हाटी समुदाय को केंद्र सरकार द्वारा अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया गया है लेकिन हिमाचल हाई कोर्ट ने जनवरी 2024 में इस पर अस्थायी रोक लगा दी थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे अनुसूचित जातियों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
उत्तराखंड में इस समुदाय को 1967 में ही एसटी दर्जा प्राप्त हो चुका है। हिमाचल में लगभग 1.5 से 2 लाख लोग इस समुदाय से हैं जिनमें से अधिकतर सिरमौर के ट्रांस गिरी क्षेत्र में रहते हैं।
हालिया जोड़ीदारा विवाह ने भारत में परंपरा और आधुनिकता के बीच के टकराव को उजागर कर दिया है। जहां एक ओर यह शादी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती है वहीं दूसरी ओर इसके सामाजिक और कानूनी पहलुओं पर बहस जारी है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि भारत की बहुविवाह और आदिवासी प्रथाओं को लेकर न्यायिक व सामाजिक दृष्टिकोण किस दिशा में आगे बढ़ता है।


