हिंदुस्तान तहलका / विष्णु हरि पाठक
हरियाणा के सोनीपत ज़िले के गांव बुआना लाखू का सरपंच चुनाव अब इतिहास में दर्ज हो गया है। लगभग ढाई साल की कानूनी जंग के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाते हुए हारे हुए उम्मीदवार मोहित कुमार को विजेता घोषित किया।
यह फ़ैसला 2 नवंबर 2022 को हुए चुनाव से जुड़ा है। उस समय कुलदीप सिंह को विजेता घोषित किया गया था और उन्हें प्रमाणपत्र भी मिल गया था। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने दोबारा हुई वोटों की गिनती में गड़बड़ी सामने आने के बाद नतीजा पलट दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों पलटा फ़ैसला?
सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच (जस्टिस सूर्यकांत, दीपांकर दत्ता और एन. कोटीश्वर सिंह) ने आदेश दिया कि गांव में कुल 3,767 वोट पड़े थे।
इनमें से 1,051 वोट मोहित कुमार को मिले, जबकि 1,000 वोट कुलदीप सिंह को।
यानी मोहित कुमार 51 वोटों से विजेता घोषित किए गए।
यह पूरी गिनती सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार की निगरानी में दोनों उम्मीदवारों और उनके वकीलों की मौजूदगी में की गई। प्रक्रिया की वीडियोग्राफी भी कराई गई जिससे किसी तरह का संदेह न रहे।
गड़बड़ी कहाँ हुई थी?
मोहित कुमार के अनुसार सबसे बड़ी गड़बड़ी बूथ नंबर 69 पर हुई थी।
उनका दावा है कि उन्हें वास्तविक रूप से 254 वोट मिले थे।
लेकिन गिनती में उन्हें सिर्फ़ 7 वोट दर्ज किए गए।
वहीं उनके वोट कुलदीप सिंह के खाते में जोड़ दिए गए।
मोहित ने कहा कि यह जानना मुश्किल है कि यह सिर्फ़ ग़लती थी या किसी मिलीभगत का नतीजा। इसलिए इसकी जांच होनी चाहिए।
कानूनी लड़ाई का सफ़र
- 2022: चुनाव में हार घोषित होने के बाद मोहित कुमार ने अदालत का रुख़ किया।
- 2025 (अप्रैल): पानीपत की इलेक्शन ट्राइब्यूनल कोर्ट ने वोटों की पुनर्गणना का आदेश दिया।
- 2025 (जुलाई): पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने यह आदेश रद्द कर दिया।
- 2025 (अगस्त): सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई की और सभी बूथों की वोटों की दोबारा गिनती कराई।
- 11 अगस्त 2025: सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया।
- 14 अगस्त 2025: मोहित कुमार ने शपथ ली और आधिकारिक रूप से सरपंच बने।
ग्रामीणों और मोहित की प्रतिक्रिया
मोहित कुमार ने कहा न्यायपालिका में उम्मीद अब भी बची हुई है। इस फ़ैसले से न्यायपालिका पर भरोसा और मज़बूत हुआ है। मैं सिर्फ़ सच को सामने लाना चाहता था।
गांव के लोग भी इस फ़ैसले से खुश हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने जिस उम्मीदवार पर भरोसा किया था अंततः वही विजेता बना।
बुआना लाखू का यह मामला सिर्फ़ एक गांव का चुनावी विवाद नहीं है बल्कि यह दिखाता है कि भारत में लोकतंत्र और न्यायपालिका किस तरह मिलकर सच्चाई को सामने लाते हैं।


